Md Imran I 2 जनवरी I गाजियाबाद I
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस वीडियो ने ग़ाज़ियाबाद पुलिस की कार्यशैली को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।
वीडियो में कुछ पुलिसकर्मी झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लोगों से पूछताछ करते हुए उनके पहचान पत्र देखते नज़र आते हैं। इसी दौरान पुलिसकर्मी वहां मौजूद लोगों से सवाल करते हैं—
“बांग्लादेश से तो नहीं हो?”
जब एक व्यक्ति इसका जवाब ‘नहीं’ में देता है, तो पुलिसकर्मी कथित तौर पर उसकी पीठ पर “मशीन लगाने” की बात करते हैं और फिर मोबाइल फोन की ओर इशारा करते हुए कहते हैं—
“मशीन तो बांग्लादेशी बता रही है।”
दरअसल, यह वीडियो उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ियाबाद का बताया जा रहा है, जहां कौशांबी थाना क्षेत्र में पुलिस बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान को लेकर झुग्गी-बस्तियों में सत्यापन अभियान चला रही थी। इसी दौरान यह पूरी घटना कैमरे में क़ैद हो गई।
वीडियो के सामने आते ही सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर ग़ाज़ियाबाद पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे। वीडियो शेयर करते हुए एक यूज़र ने तंज कसते हुए लिखा कि ग़ाज़ियाबाद के एक थाने के एसएचओ के पास ऐसी “मशीन” है, जो चंद सेकेंड में किसी भी इंसान की नागरिकता बता देती है।
यहीं से यह वीडियो एक गंभीर मुद्दे से ज़्यादा व्यंग्य का विषय बन गया। सवाल यह नहीं है कि पुलिस सत्यापन कर रही है या नहीं, सवाल यह है कि क्या नागरिकता जैसी संवेदनशील पहचान अब मज़ाकिया टिप्पणियों और कथित तंज़िया मशीनों के सहारे तय की जाएगी? मामले के तूल पकड़ने के बाद ग़ाज़ियाबाद पुलिस की ओर से सफ़ाई भी दी गई। पुलिस ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि अपराध नियंत्रण के तहत समय-समय पर अस्थायी बस्तियों और झुग्गियों में संदिग्ध व्यक्तियों से पूछताछ और दस्तावेज़ों के आधार पर सत्यापन किया जाता है। इसी प्रक्रिया के तहत कौशांबी थाना पुलिस ने कार्रवाई की थी। हालांकि पुलिस की सफ़ाई अपनी जगह है, लेकिन वायरल वीडियो यह सवाल छोड़ जाता है—
क्या सत्यापन की प्रक्रिया संवेदनशीलता और गरिमा के साथ की जा रही है, या फिर मज़ाकिया लहज़े में कही गई बातें आम लोगों के सम्मान और अधिकारों पर भारी पड़ रही हैं?
क्योंकि कानून का उद्देश्य अपराध पर नियंत्रण है, न कि नागरिकता को व्यंग्य का विषय बनाना।